क्रिप्टो से आगे ब्लॉकचेन: हेल्थकेयर, वोटिंग और सप्लाई चेन में इसका भविष्य
दोस्तों, ज़रा एक पल के लिए सोचिए। आपकी ही तरह एक मिडिल-क्लास परिवार की महिला है - रीना। वो सरकारी स्कूल में टीचर है। महीने के आखिर में इतना ही पैसा बचता है कि बच्चों की फीस और दवाई का खर्च किसी तरह निकल जाए। एक दिन उसे अपने बेटे की पुरानी एलर्जी रिपोर्ट चाहिए थी। अस्पताल पहुंची तो पता चला फाइल कहीं गुम हो गई। कंप्यूटर में देखा तो वहां डेटा ही क्रैश हो चुका था। डॉक्टर ने सीधा कहा - “दोबारा टेस्ट करवाइए।” अब आप खुद सोचिए, ऐसे में किसी मां पर क्या गुजरती होगी। रीना उस दिन सच में बहुत टूट गई थी। अब दूसरी कहानी सुनिए। सैंडीप, 28 साल का एक आईटी प्रोफेशनल। दिल्ली के एक छोटे से फ्लैट में अकेला रहता है। वोटिंग के दिन वो सुबह-सुबह लाइन में लगा, घंटों इंतज़ार किया और फिर जाकर अपना वोट डाला। लेकिन शाम को जब टीवी पर रिजल्ट देखे तो वो हैरान रह गया। उसके दिमाग में बस एक ही सवाल था - “यार, ये वोट आखिर गए कहां?” और एक तीसरी कहानी भी है। राकेश की। राकेश लखनऊ का एक छोटा व्यापारी है जो गुजरात तक मसालों का कारोबार करता है। हर महीने एक कंटेनर माल आता है। लेकिन कई बार ऐसा होता है कि आधा माल मिलाव...